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पढ़िए स्वर्गीय श्री केदारनाथ सिंह की एक अप्रकाशित कविता|

अबकी वोट देने पहँुचा तो अचानक पता चला मतदाता सूची में मेरा नाम ही नहीं है किसी से कुछ पूछँू कि मेरे भीतर से आवाज आई— उजबक की तरह ताकते क्या हो न सही मतदाता सूची में उस विशाल सूची में तो हो ही जिसमें वे सारे नाम हैं जो छूट जाते हैं बाहर बाहर… Continue reading पढ़िए स्वर्गीय श्री केदारनाथ सिंह की एक अप्रकाशित कविता|

अबकी वोट देने पहँुचा
तो अचानक पता चला
मतदाता सूची में
मेरा नाम ही नहीं है
किसी से कुछ पूछँू कि मेरे भीतर से
आवाज आई—
उजबक की तरह ताकते क्या हो
न सही मतदाता सूची में
उस विशाल सूची में तो हो ही
जिसमें वे सारे नाम हैं
जो छूट जाते हैं बाहर

बाहर निकला
तो निगाह पड़ी सामने खड़े पेड़ पर
सोचा—वह तो नागरिक है इसी मिट्टी का
और देखो न मरजीवे को
खड़ा है कैसा मस्त मलंग!

मैं पेड़ के पास गया
और उसकी छाँह में बैठे-बैठे
आ गई झपकी
देखा—पेड़ के नेतृत्व में
चले जा रहे हैं बहुत पेड़ और लोग
जिसमें शामिल हैं—
बड़
पाकड़
गूलर
गँभार
मसान काली का दमकता सिन्दूर
चला जा रहा था आगे-आगे
कि सहसा एक पत्ती के गिरने का
धमाका हुआ
और टूट गई नींद
मैंने देखा
अब मेरी जेब में मेरा अनदिया वोट था
—एक नागरिक का अंतिम हथियार—

मैंने खुद से कहा
अब घर चलो केदार
और खोजो इस व्यर्थ में
नया कोई अर्थ

 राजप्रकाश प्रकाशन के सौजन्य से|

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