असम: दस्तावेज़ों का हिंदी में होना एनआरसी सूची से बाहर होने का बना आधार, हिंदी भाषी लोग परेशान
असमी और बंगाली भाषा एनआरसी कर्मचारी इन हिंदी के दस्तावेज़ों को पढ़ ही नहीं पाए, न उसका सत्यापन कर पाए। इस कारण एनआरसी सूची से में ज़्यादातर लोगों का नाम ही नहीं आ सका।
एनआरसी सूची में शामिल नामों के सत्यापन की प्रक्रिया में कुछ लापरवाहियां बहुत चौंकाने वाली हैं। एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 1971 के बाद बिहार, उत्तर प्रदेश,राजस्थान आदि हिंदी भाषी राज्यों से असम आए लोग नागरिकता के लिए अपने मूल राज्यों के दस्तावेज़ जमा करवाए थे जिन्हें अस्वीकार कर दिया गया। इसका आधार उनके दस्तावेजों का हिंदी में होना है। असमी और बंगाली भाषी एनआरसी कर्मचारी इन हिंदी के दस्तावेज़ों को पढ़ ही नहीं पाए, न उसका सत्यापन कर पाए। इस कारण एनआरसी सूची में ज़्यादातर लोगों का नाम ही नहीं आ सका।
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार एनआरसी के असम समन्वयक प्रतीक हजेला भी मानते हैं कि पूरी प्रक्रिया में गतली संभव है, जिन्हें सुधार लिया जाएगा।
दैनिक भास्कर को जोरहाट के एक व्यवसायी, गजेंद्र जैन ने बताया, “मैं राजस्थान का रहने वाला हूँ, लेकिन मेरा परिवार करीब 100 साल से असम में रहता है। अब राजस्थान से कोई लेना-देना नहीं है। सभी दस्तावेज़ दाखिल करने के बावजूद मेरे परिवार का नाम नहीं है।” गजेंद्र एक नहीं, गजेंद्र की तरह ही और भी लोगों की कहानी है। लोग इतने सालों से असम में रह गए हैं कि मूल राज्य से 1971 से पहले का डॉक्यूमेंट्स ढूंढ़कर लाना मुश्किल हो रहा है।
मूलरूप से पूर्णिया, बिहार के रहने वाले संतोष वैद बताते हैं कि वो खुद पुराने वोटर लिस्ट की प्रति लाने बिहार के पूर्णिया गए थे। लेकिन वे अपने बुजुर्गों का बूथ और उनका नाम नहीं खोज सके। यहां तक अधिकारियों ने भी उनकी कोई मदद नहीं की।
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में लाखों ऐसे लोगों का नाम नहीं शामिल किया गया जिन्होंने वेरिफिकेशन के लिए पर्याप्त दस्तावेज़ सौंपे थे। लोगों को अब अपने भविष्य की चिंता सता रही है।
गौरतलब है कि पिछले सोमवार को जारी एनआरसी मसौदे से 40 लाख लोगों के नागरिकता पर तलवार लटक रही है। हालांकि अभी सरकार के द्वारा लोगों को पुन: नागरिकता की दावेदारी पेश करने के लिए मौके दिए जाएंगे लेकिन इसका कोई भरोसा नहीं है कि इस प्रक्रिया में जो अनियमितताएं अभी नज़र आ रही हैं वह तब नहीं आएँगी।