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हड़ताल प्रदेश में बदलता जा रहा है छत्तीसगढ़, रमन सरकार बीच का रास्ता निकालने में हो रही है विफल

छत्तीसगढ़ में कई एसोसिएशन फेडरेशन हड़ताल पर, लोगों को उठानी पड़ रही है परेशानी

भाजपा शासित प्रदेश हड़ताल प्रदेश में बदल रहे हैं। अपने-अपने प्रदेश में बड़े-बड़े वादों पर सवार होकर आयीं भाजपा सरकारें जब अपनी चुनावी घोषणाओं को पूरा करने में विफल साबित हो रही हैं तो राज्य की जनता सड़कों पर उतर आयी हैं। एक तरफ मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर हड़ताल हो रहे हैं तो दूसरी ही तरफ छत्तीसगढ़ में भी हड़ताल का सिलसिला जारी है।

जनचौक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ किसान, शिक्षक, युवा, बेरोजगार, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, डाटा एंट्री आपरेटर, संजीवनी वाहन चालक, आदिवासी, पत्रकार यहां तक की पुलिसकर्मी भी सड़क पर उतर आए हैं।

सभी का यही कहना है कि रमन सरकार ने अपने चुनावी वादे पूरे नहीं किए इसलिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़ रहा है। हालांकि सरकार ने इन आंदोलनों को कुचलने की भरपूर कोशिश की है लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकलता नहीं दिख रहा है। आंदोलनकारी और भी दृढता से आगे आ रहे हैं।

ज्ञात हो कि पिछले 15 सालों से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है पर उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए उनके पास एक ढेला भी नहीं है। लिहाज़ा अब लोगों का सब्र का बांध टूट गया है और अब कोई चारा न देख जनता ने अपना वाजिब हक माँगना शुरू कर दिया है।

संजीवनी चालक वाहक से लेकर कोटवार एसोसिएशन तक हड़ताल पर

न्यूनतम मानदेय सहित कई दूसरी मांगों को लेकर संजीवनी और महतारी एक्सप्रेस के कर्मचारी हड़ताल पर है। बीते एक सप्ताह से इसके करीब 4000 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए ये लोग विरोध के अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन की भी बीजेपी के 2013 के घोषणा पत्र में शामिल वायदों को पूरा करने की मांग करते हुए हड़ताल जारी है। इसमें राज्य के विभाग से लेकर तहसील स्तर तक के कर्मचारी शामिल हैं।

कर्मचारी ह़ड़ताल के चलते कई सरकारी विभागों में ताले जड़े हुए हैं। फेडरेशन की मांग है कि उन्हे सातवे वेतनमान के तहत 18 महिने का एरियर , महंगाई भत्ता में बढ़ोतरी, बकाया डीए का भुगतान और पेंशन की योग्यता 33 की जगह 25 करना शामिल किया जाए।

इसके अलावा राज्य में वेतन वृद्धि सहित सात सूत्रीय मांगों को लेकर कोटवार एसोसिएशन भी हड़ताल के कतार में खड़ी है।

हड़ताल और सरकार के बीच जनता को बहुत मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है। सरकार इन सभी प्रदर्शनकारियों की समस्याओं का समाधान करने की जगह आंदोलन को किसी भी तरह दबाने की कोशिश कर रही है। सरकारी व्यवस्था ठप होने से लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

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